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देश भर में मनाया जा रहा हिंदी दिवस, हिंदी भाषा के विकास को लेकर साहित्यकारों ने रखा अपना पक्ष

पूरे देश में आज का दिन हिंदी दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। 14 सितंबर को ही हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया था और तब से लेकर हर वर्ष इस दिन को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। 1 सितंबर से हिंदी माह के रूप में कई तरह के कार्यक्रम किए जा रहे हैं। वहीं अनेक स्थानों पर 14 सितंबर से लेकर 28 सितंबर तक चलने वाले हिंदी पखवाड़े की भी शुरुआत हो चुकी है।

हिंदी देश में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है, इसी कारण लोगों में इस भाषा को लेकर खासी रुचि देखी जाती है। हिंदी दिवस को देखते हुए मंडला में भी इसी तरह का एक कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसकी थीम “साहित्य समाज का दर्पण” रखी गई।

हिंदी, समाज और राष्ट्रहित इन बिंदुओं को केंद्र में रखकर साहित्यकारों ने अपने मत रखे। कार्यक्रम में सरोज पांडे बवलिया, निशा मिश्रा, डॉक्टर इंदु मिश्रा, अनीता गोयल, मनोरमा दिक्षित, योगिता चौरसिया अनीता दुबे, रश्मि मिश्रा, अर्चना जैन आदि प्रतिभागियों और साहित्यकारों की उपस्थिति देखी गई।

मीडिया से हुई बातचीत में विभिन्न साहित्यकारों ने हिंदी दिवस पर अपने अपने मत रखे हैं। हिंदी साहित्यकार कल्पना पांडे का मानना है कि हिंदी भाषा हमारे जीवन मूल्यों, संस्कार और संस्कृति की परिचायक है और आधुनिक पद्धति के बीच एक सेतु है। हिंदी अनुवाद की नहीं संवाद की भाषा है और इसने विश्व स्तर पर एक पहचान बनाई है ।

वहीं अखिल भारतीय हिंदी सेवा समिति की प्रदेश अध्यक्ष डॉक्टर संध्या शुक्ला का कहना है कि देश में हिंदी बोलने लिखने वालों की संख्या बढ़ रही है।हिंदी भाषा को राष्ट्र भाषा बनाने की आवश्यकता है।

हिंदी दिवस के मौके पर डॉ रश्मि बाजपेई ने भी अपने विचार प्रस्तुत किए। उनका मानना है कि हिंदी विश्व पटल पर चांद सी शीतलता बिखेरने वाली और सूरज की रोशनी देने वाली एक भाषा है। यह हमारी आधारशिला है। हमें सभी भाषाएं सीखनी चाहिए लेकिन हिंदी को जीवन में प्राथमिकता देनी चाहिए।

हिंदी साहित्यकार डॉ इंदु मिश्र का भी मानना है कि मातृभाषा हिंदी को सम्मान देना चाहिए। विश्व भाषा बनाने में शिक्षा के रूप में हिंदी को अनिवार्य करना चाहिए।

इसी मौके पर उषा अग्रवाल ने भी राजभाषा हिंदी के विस्तार की बात कही। उनका मानना है कि जनसंचार माध्यमों का उपयोग करके हिंदी के मानक किंतु लचीले स्वरूप के प्रसारण की महीन आवश्यकता है।

अनामिका दुबे ने भी हिंदी के उत्थान की बात की। दुबे का कहना था कि हिंदी भाषा हमारे देश के संस्कार और संस्कृति का प्रतिबिंब है। सूचना प्रौद्योगिकी में हिंदी का इस्तेमाल बढ़ रहा है और ज्ञान विज्ञान की पुस्तकें भी हिंदी में लिखी जा रही हैं। सोशल मीडिया में भी हिंदी का निरंतर प्रयोग बढ़ रहा है। हिंदी बहुत जल्द विश्व में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा बनेगी।

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