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जिला प्रशासन द्वारा देवांता अस्पताल को किया गया सील, जांच रिपोर्ट में सामने आईं कई गड़बड़ियां

22 सितंबर को देवांता अस्पताल में इलाज की लापरवाही के चलते एक महिला की मृत्यु की खबर सामने आई थी। साथ ही अस्पताल प्रशासन पर जबरन पैसे वसूलने और धोखाधड़ी करने का मामला भी दर्ज किया गया था। प्रशासन द्वारा इस मामले की जांच के लिए 4 सदस्यों की एक कमेटी गठित की गई थी।

इसी कमेटी ने अपनी जांच में अस्पताल प्रबंधन को लापरवाही बरतने, धोखाधड़ी करने, जबरन पैसा वसूलने और नियमों की अनदेखी करने के मामले में दोषी पाया और अस्पताल को सील कर दिया गया।

शहडोल जिला प्रशासन द्वारा लिए गए फैसले के साथ यह भी बताया गया है कि जब तक इस मामले की पूरी जांच नहीं हो जाती है तब तक अस्पताल में ताला लगा रहेगा और इलाज संबंधी सारे काम बंद रहेंगे। जांच कमेटी ने 7 घंटे तक अस्पताल की पड़ताल की और कई अनियमितताएं सामने आईं।

कमेटी ने पाया कि अस्पताल में भर्ती मरीजों का इलाज गैर अधिकृत डॉक्टरों द्वारा किया जाता था। अस्पताल होम्योपैथिक डॉक्टरों द्वारा चलाया जा रहा था, जबकि विभिन्न प्रकार की जांच आदि के लिए एलोपैथिक डॉक्टर का होना जरूरी है। इतना ही नहीं बल्कि अस्पताल प्रबंधन द्वारा आवश्यक स्टाफ की सूची भी नहीं दी गई है। साथ ही 22 सितंबर को जिस महिला की मृत्यु हुई थी वह एक मेडिको लीगल केस था इसके बावजूद अस्पताल ने पुलिस को सूचना नहीं दी।

यह सारी गड़बड़ियां मध्यप्रदेश उपचार्यागृह तथा रूज उपचार संबंधी स्थापनाओं का उल्लंघन है। इसी के तहत जिला प्रशासन द्वारा अस्पताल को सील कर दिया गया है। जांच कमेटी ने यह भी पाया कि मृतक पुष्पा राठोर के इलाज में भी कई तरह की लापरवाही बरती गई थी। चिकित्सकों द्वारा महिला की रिपोर्ट में संभावित डायग्नोसिस दर्ज किया गया था जबकि जांच में यह पाया गया कि महिला सीकेडी क्रॉनिक किडनी डिजीज की मरीज थी। इसके अलावा महिला की केस सीट में किसी भी डॉक्टर का नाम नहीं लिखा गया था। दस्तावेजों में ओवर राइटिंग और मैनिपुलेशन भी किया गया था।

कमेटी ने अपनी जांच में यह भी पाया कि अस्पताल के डॉक्टर दूसरे क्लीनिक में भी नियमित ओपीडी व अन्य सेवाएं देते हैं। मृतक महिला के पति द्वारा अस्पताल प्रबंधन पर पैसे वसूलने का लगाया गया आरोप भी कमेटी ने सही पाया है।

शहडोल जिले के इतने मशहूर अस्पताल द्वारा लंबे समय से इस प्रकार की लापरवाही और गड़बड़ियां की जा रही थीं और प्रशासन को इसकी भनक तक नहीं थी। इतने सालों में अस्पताल में न जाने कितने गरीब लोगों को लूटा होगा और इलाज में लापरवाही की होगी। इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए।

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