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जनप्रतिनिधियों ने नहीं दिया बदहाल सड़कों पर ध्यान, केवल वोट मांगते नज़र आते हैं नेता

सड़कें अच्छी हों तो क्षेत्र का विकास भी दिखाई देता है और व्यापारिक सुविधायें भी मिलती हैं। राजेंद्र-बुढ़ार मार्ग की उन्नति का आंकलन होने के बावजूद यहां पर सड़कों की हालत अत्यंत दयनीय है। खस्ताहाल सड़कों पर जोखिम भरा सफर तय करना जिले के लोगों की मजबूरी है। सड़कों पर जगह जगह गढ़े दिखाई पड़ते हैं, जिसमे पानी भर जाने से राहगीरों को आवागमन में परेशानियां होतीं हैं। बात ये नहीं है कि सड़क सुधार की मांग न की गई हो, बल्कि बार-बार, लगातार शिकायतों को दर्ज कराया गया है लेकिन प्रशासन की चुप्पी अब लोगों में आक्रोश उत्पन कर रही है। केंद्र एवं राज्य सरकार भले ही ग्रामीण सड़कों को मुख्य सड़क से जोड़ने का ढिढोंरा पीटती हो किंतु जमीनी सच्चाई कुछ और ही बयां कर रही है।

इसके चलते कई विरोध प्रदर्शन भी हुए , लेकिन प्रशासन द्वारा सिर्फ खानापूर्ति के लिए इन गढ़ों को मिटी से भर दिया जाता है, और तब क्या होना, सड़कों की हालत फिर उसी प्रकार हो जाती है इस दयनीय हालत पर न तो एसईसीएल प्रबंधन की कोई नज़र है और नाही शासन प्रशासन की, जिस कारणवश लोगों में भारी मात्रा में आक्रोश उमड़ आया है, और जायज़ भी है।

इस मार्ग में तीन कोयला खदानों की वजह से यहाँ भारी वाहनों का आना जाना लगा रहता है, और ऐसी सड़कों से गुजरने वाले लोग जान जोखिम में डाल कर यह सफर तय करते हैं। अब यहाँ के निवासियों के लिए बरसात का मौसम किसी अभिशाप से कम नहीं है।

करीब दो वर्ष पूर्व राजेंद्र कालरी गेट के सामने विधायक मनीषा सिंह के नेतृत्व में स्थानीय जनप्रतिनिधियों द्वारा धरना प्रदर्शन किया गया था जो राजनीती के भेंट चढ़ गया , इसी समय मुसीबत की जड़ उत्पन हो गई। उस वक़्त कांग्रेस सरकार के खिलाफ अपना आक्रोश दिखाने के लिए जैतपुर विधायक ने सक्रियता दिखाई, लेकिन एसईसीएल ने केवल लीपा पोती कर अपना पला झाड़ दिया। यदि उस समय यह कार्य हो चूका होता तो आज स्थिति इतनी भयावह नहीं होती। 40 से भी अधिक गाँव के हज़ारों से भी ज़्यादा लोग इन सड़कों से आवागमन करते हैं, क्या प्रशासन कोई बड़े हादसे का इंतज़ार कर रही है?

जब धरना प्रदर्शन भी कहीं कम होता नज़र नहीं आ रहा तो लोग अब सोशल मीडिया का सहारा ले रहे हैं। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि इन सड़कों की जर्जर हालत देख कर लोगों का गुस्सा सातवे आसमान पर पहुँच गया है, और यह झलक सोशल मीडिया में भी देखी जा सकती है।

कहीं जगह जगह गढ़े हैं तो वहीँ गर्मी के दिनों में कोयला युक्त डस्ट आम आदमी के स्वास्थ पर बुरा असर डाल रहा है। अब लोग यह मान चुके हैं की बिजली, पानी और सड़क जैसी मूलभूत सुविधा उनके हक़ में नहीं है। उनका कहना है कि आये दिन बिजली कटौती होना, और साथ ही में इन सड़कों की हालत, अब यह हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा बन चूका है।

लोगों ने आक्रोश व्यक्त करते हुए यह भी कहा की चुनाव आते ही क्षेत्रीय नेता और चुनावी दावेदार बिजली, पानी और सड़क के मुद्दों को लेकर वोट मांगते हैं लेकिन जैसे ही चुनाव हो जाते हैं तो प्रबंधन और चुनावी मुद्दे दोनों ही गायब हो जाते हैं। देखने वाली बात यह होगी की सोशल मीडिया वाली आवाज़ किस ओर अपनी करवट बदलती है, देखने वाली बात यह भी होगी की आखिर कब तक लोगों को इस हालत में अपना समय व्यतीत करना पड़ेगा।

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