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वन विभाग द्वारा बांस उत्पाद से जुड़े कल्चर को बचाने और रोजगार से जोड़ने की पहल

शहडोल जैसे घने वन्य क्षेत्र वाले जिले में अनेकों किसान ऐसे हैं जो जंगली उत्पादों से अपनी जीविका चलाते हैं। उनमें बांस से बर्तन आदि बनाकर जीविका चलाने वाले किसानों और आदिवासियों की संख्या काफी ज्यादा है। लेकिन समय के साथ बांस से बने बर्तनों की प्रासंगिकता कम हो रही है और इनसे जुड़े लोगों की जीविका पर भी खतरा मंडराने लगा है।

इसी को देखते हुए वन विभाग द्वारा बांस से जुड़े उत्पादों के प्रशिक्षण के लिए शहडोल के किसानों को बालाघाट और सतना के सोनौरा से प्रशिक्षण दिलाए जाने का फैसला किया गया है।

बताया जा रहा है कि वन विभाग के इस कदम से जहाँ एक और बांस से जुड़े उत्पादों के कल्चर को बचाया जा सकेगा वहीं ऐसे सैकड़ों लोग जो बांस के बर्तन बनाकर जीविका चलाते थे, उन्हें रोजगार मुहैया कराया जा सकेगा। इसके साथ ही नई पीढ़ी को पर्यावरण से जुड़ने और जंगल से जुड़े उत्पादों के विषय में भी जानकारी हो सकेगी।

इसके लिए वन विभाग द्वारा जयसिंहनगर के पुराने कॉमन फैसिलिटीज सेंटर को फिर से शुरू करने की बात कही जा रही है। ये सेंटर 2018 में बनाया गया था, अब यहीं पर इन किसानों और आदिवासियों को प्रशिक्षण दिया जाएगा और बांस से बने उत्पादों के लिए वन विभाग द्वारा बाजार भी उपलब्ध कराया जाएगा।

इतना ही नहीं बल्कि बांस के बर्तनों के निर्माण के लिए बांस की खरीदारी भी वन विभाग उन किसानों से करेगा जो बांस का उत्पादन करते हैं, इससे इन किसानों को भी लाभ हो सकेगा।

वन विभाग द्वारा इसके लिए कार्ययोजना तैयार कर ली गई है और 15 से 20 लोगों को कॉमन फैसिलिटीज सेंटर से जोड़ कर प्रशिक्षण देने के सिलसिले में भी पहल शुरू हो चुकी है। वन विभाग का मानना है कि इस कदम से बांस से जुड़े हुए परंपरागत व्यवसाय को बचाया जा सकता है और ग्रामीण इलाकों में रोजगार बढ़ाने की दिशा में भी काम किया जा सकता है।

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