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कलेक्टर सभागर में फिर एक बार हुई जन सुनवाई, ग्रामीण लेकर के आए अपनी समस्या

कलेक्टर सभागर में हुई जनसुनवाई जहां अपर कलेक्टर अशोक ओहरी ने जिले के दूर दराज से आए ग्रामीणों की समस्या सुनी और हमेशा की ही तरह शिकायत के निराकरण के लिए अधिकारियों को निर्देश दिए, जिसे आगे चल के अधिकारी जन एक कान से सुन कर के दूसरे कान से निकाल दिया करते हैं।

जगह से लेकर, बिजली से लेकर, आवश्यक जरूरतों को पूरा करने से लेकर, भूमि का सीमांकन से लेकर हर एक आरजू अपर कलेक्टर के समक्ष रखी गई।

अब देखने वाली बात यह होगी की आखिर कब तक लोगों को इनका हक और समस्या का हल मिल पाएगा। यह बात चिंताजनक है क्योंकि, आए दिन जनसुनवाई होती रहती है और उसी के साथ -साथ लोगों की शिकायतों का स्तर भी कोई सुधरा नही है। लोगों को आज भी अपने मूलभूत अधिकार के लिए दर दर भटकना पड़ता है। यह अधिकारियों को आदेश दो दिए जाते हैं लेकिन जमीनी हकीकत क्या है क्या नही इसकी जांच करने कभी कोई पहुंचता भी नही, पहुंचना खेर दूर की बात है, जानने की कोशिश भी कोई नही करता। हाँ, यह बात जरूर है की कभी कबार सालों में बड़े आधिकारी भ्रमण करने पहुंचते हैं, लेकिन तब भ्रमण करके क्या फायदा जब पानी सर से ऊपर चला गया?

यह काम केवल पेपरों तक ही सीमित रह जाते हैं, इनको अमल करने में अक्सर काफी पीछे छूट जाती है प्रशासन। भोले लोग की बड़ी बड़ी कतार में लगने के बाद, दर बदर ठोकर खाने के बाद, की जगह अपने अधिकार के लिए गुहार लगाने के बाद जब आखिर कार इन बड़े अफसरों के दर पहुंचते है तब भी कहीं हल तत्काल नही मिलता।

ऐसे में एक आम इंसान करे भी तो क्या करे, अब लोगों को इसकी आदत सी पड़ गई है। आज हर अखबार में हर मीडिया में यह खबर निकल कर के आती है की आज यहाँ जन सुनवाई हुई, आज वहाँ जनसुनवाई हुई। यह बड़े अफसर वहाँ पहुंचे, उनके द्वारा लोगों की समस्या सुनी गई, उसके हल के लिए आदेश दिए गए, और पता नही क्या क्या।

अब हम नागरिकों को यह पहल करनी चाहिए की आखिर जनसुनवाई तो हुई लेकिन फिर भी क्यूँ आज लोग खुश नही है? क्यूँ लोग आज भी तड़प रहे है? क्यूँ दर बदर भटक रहे हैं? आखिर क्यूँ ? क्या कभी यह बड़े अफसरों ने जिन अधिकारियों को यह निर्देश दिया करते हैं, उनसे बार बार लगातार पूछने की कोशिश की, की क्या कुछ डेवलपमेंट इस केस में देखा गया हो? इसका सीधा जवाब है, नही। अब देखने वाली बात होती है की कितने लोगों को इन जनसुनवाई से अपना हक प्राप्त हो पाता है, और कितने लोगों को अगली जनसुनवाई का इंतज़ार होगा।

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