People are not getting food under Taliban rule. Lakhs of people were fired from their jobs.
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तालीबान के राज में लोगो को खाना नसीब नही, लाखो लोग नौकरी से निकाले गए।

15 अगस्त 2021 की तारीख को जब भारत में हम लोग स्वतंत्रता दिवस मना रहे थे तब ठीक उसी तारीख को हमारा एक पड़ोसी देश गुलामी, दहशत और आतंक के हाथों जकड़ लिया गया। अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में तालीबान का कब्जा हो चुका था। अफ़्ग़ानिस्तान की जमीन पर काफी पहले से तालिबान का साया रहा है। यहां इसके आतंक की शुरुआत 1990 के दशक में सोवियत संघ की सेना के अफगानिस्तान छोड़ने के बाद हुई। इसके बाद तालिबान ने कंधार पर कब्जा करके वहाँ अपना पहला केंद्र बनाया। अगले कुछ सालों में तालिबान ने लगभग 90% अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया।

शुरुआत में यहां के लोगों ने इसका समर्थन किया कि देश की व्यवस्थाओं में सुधार आएगा। लेकिन धीरे-धीरे उन्हें चोरी करने पर मौत की सजा दी जाने लगी। टीवी देखने, संगीत सुनने पर बैन लगा दिया गया और लड़कियों के स्कूल जाने पर प्रतिबंध लागू कर दिया गया। ओसामा बिन लादेन के पूरी दुनिया को हिलाने वाले अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर आतंकी हमले करने के बाद अमेरिकी सेना ने अफगानिस्तान में घुसकर तालिबानी सरकार को वहां से भागने पर मजबूर कर दिया। इसके बाद वहां शांति व्यवस्था कायम रही।


हालात बदले जब पिछले साल अप्रैल में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाईडेन ने अफगानिस्तान से अपनी सेना को वापस बुला लिया। मई 2021 से तालीबान ने फिर हमले शुरू कर दिये। बड़ी तेजी से आगे बढ़ते हुए उसने 15 अगस्त को अफगानिस्तान की राजधानी काबुल पर कब्जा कर लिया राष्ट्रपति अशरफ गनी ने देश छोड़ दिया और राष्ट्रपति भवन पर तालिबानी राज कायम हो गया। इसके बाद पूरे देश में दहशत के काले बादल छा गए। लोग अपनी जान बचानी के लिए पलायन करने लगे।

यहाँ के एयरपोर्ट पर ऐसी भगदड़ देखी गई जिसकी तस्वीरे सामने आने के बाद विश्व के हर कोने में यहां के लोगों की चिंताजनक स्थिति पर बहस छिड़ गई। महिलाएं अपने बच्चों को देश छोड़ते अमेरिकी सैनिकों की ओर फेकती नजर आई तो हवाई जहाज के पहियों से लटके पुरुष ऊंचाई से गिरते हुए मरते देखे गए। कई पत्रकारों को देश छोड़कर भागना पड़ा।


आज तालिबान को सत्ता में आए करीब 5 महीने हो गए हैं। सत्ता में आने के बाद तालिबान की ओर से लोगों को कई वादे किए गए जिनमें स्वतंत्रता से रहने और लड़कियों को स्कूल जाने की इजाजत देना प्रमुख थे, लेकिन असलियत ये है की वहाँ के लोगो को अब भूखे मरने की नौबत आ गई है। महिलाओं को सरकारी नौकरियों से निकाल दिया गया है और लड़कियां स्कूल नहीं जा पा रही। तालिबान के आने के बाद से सरकारी में कर्मचारियों को सैलरी नहीं मिल पा रही। करीब 5 लाख लोगों को अपनी नौकरियों से हाथ धोना पड़ा है और इसकी तादाद बढ़ने की आशंका है। हालत इस कदर खराब है कि लोगों को मामूली खाना तक नसीब नहीं हो रहा।

दरअसल तालिबान के कब्जे के बाद ही पश्चिमी देशों ने इनको दी जाने वाली मदद बंद कर दी थी। अब तक किसी भी देश ने तालिबान को मान्यता नहीं दी है। तालिबान के प्रधानमंत्री मुल्ला मोहम्मद हसन अखुन्द् इस्लामिक देशों से अपनी सरकार को मान्यता देने का आग्रह कर रहे हैं। इस्लामिक देशों में पाकिस्तान और कतर जैसे देशों ने तालिबान को लेकर निराशा है।वहाँ महिलाओं की स्थिति देखकर कतर इसे मान्यता नहीं देना चाहता। वही सऊदी अरब पर चोरी छिपे तालिबान की फंडिंग करने के आरोप लग रहे हैं।

भुखमरी बेरोजगारी और आतंक के साए में रह रहे अफगानिस्तान के लोगों के लिए विश्व भर के देशों और संगठनों की अनदेखी मानवीय संवेदना और इन संगठनों के अस्तित्व को नकारती है। यहां के हालातों पर दुनिया का जल्द ही ध्यान देना बहुत जरूरी है

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