There is a lot of money to make a statue but not for the problems of the people.
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स्टैचू बनाने के लिए खूब पैसे हैं लेकिन लोगों की परेशानियों के लिए नही

महाराष्ट्र के CM उद्धव ठाकरे ने 23 जनवरी को महाराणा प्रताप चौक, मझगांव, मुंबई में अपने बेटे और राज्य मंत्री आदित्य ठाकरे, मुंबई के मेयर किशोरी पेडनेकर और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के साथ महाराणा प्रताप की एक प्रतिमा का अनावरण किया। यह बात पर गौर फरमाना बेहद जरूरी है की ऐसे समय में जब देश आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रहा है, तीसरी लहर देश में दस्तक दे चुकी है तो कितना जरूरी है इन स्टैचू का होना?

और इनपर करोड़ों रुपए का खर्च, आखिर कितना जायज है? ये बात केवल महाराष्ट्र की नही हो रही बल्कि देश में हर ओर कुछ ऐसा ही समा देखने को मिलेगा। नए सांसद भवन की ही क्यूँ न बात कर ली जाए, अब इन हालातों में यह कहना बिल्कुल गलत नही होगा की सरकार द्वारा उठाया गया यह कदम अंतिम संस्कार के वक्त डीजे बजाने के बराबर है।

हम ऐसे देश में रह रहे हैं जहां स्टैचू बनाने के लिए पैसों की कोई कमी ही नही देखि जाती, जनता के टैक्स के पैसों से पूरी पूरी रकम स्टैचू पर हुमारे दिगज नेता कर देते हैं, लेकिन कोई उन्हे पूछने वाला नही है, कोई जवाबदेही नही है। गुजरात में स्टैच्यू ऑफ यूनिटी की दर्शक गैलरी में वर्षा का पानी घुस गया है, अधिकारियों द्वारा यह बताया गया कि 135 मीटर ऊंची इस गैलरी के सामने ग्रिल लगा है जिससे भारी वर्षा के दौरान तेज हवा के साथ पानी घुस जाता है।

जो सरकार की जिम्मेदारी थोड़े ही है। इस मूर्ति के बारे में सरकार खूब सारी अच्छी-अच्छी बातें कर रही थी। कोई इसे दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ति होने को लेकर गर्व कर रहा था, तो कोई मान रहा था कि लौह पुरुष को सम्मान देकर सरकार ने बहुत अच्छा काम किया है. इस मूर्ति के बनने से पर्यटन को बढ़ावा देने और नौकरियां पैदा होने की बातें भी खूब हो रही थी, लेकिन जमीनी तौर पर हुआ क्या है, और कितना कुछ हुआ है, हम सभी इससे मूहेया है।

हमारा मतलब यह नही है की एक महान पर्सनैलिटी जिन्होंने देश की सेवा करते करते अपने प्राण न्योछावर कर दिए उनके लिए यह सब नही किया जाना चाहिए, लेकिन भारत जैसे देश में, जहां लाखों बच्चे भूख और गरीबी से हर साल मर जाते हैं, उस देश के लिए इन स्टैचू को बनाने की लागत कई ज्यादा है. इस पैसे से स्कूलों या अस्पतालों की चेन बनाई जा सकती है, जिन्हें फ्रीडम फाइटर का नाम दिया जा सकता है. उनके नाम पर इन पैसों का इस्तेमाल करके सड़कों का जाल बिछाया जा सकता है. या फिर उनके नाम पर फूड सिक्योरिटी स्कीम लाकर भी उन्हें श्रद्धांजलि दी जा सकती है

हाल कुछ ऐसा है की मानो मेमोरियल और मॉन्यूमेंट बनाकर लोगों की नजरों में चढ़ जाने की एक स्पर्धा सी चल पड़ी है, बेशक कोई इस बात को नहीं मानेगा, लेकिन क्रांतिकारियों को अपनी खुद की सबसे ऊंची मूर्ति देखने से अधिक खुशी इस बात से होती कि देश के लोगों को बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य और सेवाएं मिलें. लौह पुरुष को महज एक कांसे की मूरत बनाने के अलावा भी कई अन्य तरीकों से श्रद्धांजलि दी जा सकती है।

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