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A Thursday Movie Review

इस मूवी ‘ए थर्सडे’ के बारे में सबसे अच्छी बात ये है कि ये एक अच्छा सोशल मैसेज देती है, अगर आपको कहानी पता नहीं है या आपने कोई मूवी रिव्यू नहीं पढ़ा है तो ये शुरू से आखिर तक आपको पकड़ के रखती है, सस्पेंस बनाए रखती है. लेकिन टाइटल पढ़ते ही आपको लगता है कि ‘ए वेडनेस्डे’ से कॉपी किया हुआ या प्रभावित है. फिर मूवी पूरी देखने के बाद लगता है काफी कुछ चीजें दूसरों से ‘इंस्पायर्ड’ हैं. फिर भी ‘सस्पेंस और पेस’ के चलते तमाम लोगों को ये मूवी पसंद आ सकती है. ये अलग बात है कि क्लाइमेक्स देखने के बाद उनकी ये राय कायम रहे ही।

कहानी है एक प्ले स्कूल टीचर नैना जायसवाल (यामी गौतम धर) की, वो जिस स्कूल में टीचर है, उसकी बिल्डिंग क्रिमिनल लॉयर मालिक उसका मंगेतर रोहित (करणवीर शर्मा) है. तीन हफ्ते की छुट्टियों के बाद वो स्कूल आती है और पूरे स्टाफ के जाने-भेजने के बाद वहां पढ़ रहे 16 बच्चों को बंधक बना लेती है और पुलिस को फोन करके अपनी मांगें बताती हैं. एसपी (नेहा धूपिया) पर दवाब बनाती है कि केवल इंस्पेक्टर जावेद खान (अतुल कुलकर्णी) से ही बात करेगी. इसी बीच एक बच्ची को लेने आए उसके ड्राइवर व फोन भूल गई स्कूल मेड को भी पिस्तौल के दम पर बंधक बना लेती है।

जाहिर है सारा ड्रामा टीवी पर लाइव सा चल रहा होता है, एक न्यूज चैनल की एंकर का बेटा भी बंधक है, सो कहानी और दिलचस्प बनती है. फिर अपने एकाउंट में पांच करोड़ ट्रांसफर करवाती है. एक बच्चे को मार भी देती है. भागने की कोशिश करने पर ड्राइवर के पैर में गोली भी मार देती है. फिर किसी दूसरे स्कूल के 2 कर्मचारियों को बुलाने की मांग करती है और आखिर में प्रधानमंत्री (डिम्पल कपाड़िया) को बुलाने की मांग करती है. इधर मांगें पूरी करने के साथ-साथ जावेद और एसपी लगातार नैना का अतीत खंगाल रहे होते हैं. ऐसे में मूवी आखिर तक सस्पेंस बनाने में तो पूरी तरह कामयाब होती है, लेकिन जब बच्चों को बंधक बनाने की वजह सामने आती है, तो आप सभी का रिएक्शन अलग-अलग हो सकता है. वैसे ही जैसे दीपिका की मूवी ‘गहराइयां’ का क्लामेक्स देखकर लोगों को लगा था. दोनों ही मूवीज की नायिकाओं का अतीत उनके भविष्य के फैसलों को तय करता है।

देखा जाए तो अमिताभ बच्चन की मूवी ‘आखिरी रास्ता’ से लेकर  पिछले साल आई कन्नड़ मूवी ‘एक्टर 1978’ तक ये बंधक बनाने का फॉर्मूला देश ही नहीं दुनियां भर के सिनमा जगत में चलता आ रहा है, जहां सिस्टम को जगाने के लिए नायक या नायिका किसी को बंधक बनाते हैं. ‘एक्ट 1978’ और ‘ए थर्सडे’ की कहानी में कोई ज्यादा अंतर नहीं है. ‘एक्ट 1978’ मूवी में पिता की मौत के मुआवजे के लिए गर्भवती नायिका दफ्तर दफ्तर भटकने के बाद रिश्वतखोर अधिकारियों को बंधक बना लेती है और सरकार पर ‘एक्ट 1978’ खत्म करने का दवाब बनाती है, जिसके चलते कन्नड़ अधिकारियों को बर्खास्त नहीं किया जा सकता. ‘ए थर्सडे’ की कहानी भी इससे काफी मिलती जुलती है, सो कहानी में कुछ भी नयापन नहीं है। इतना ही नहीं उस मूवी में प्रेग्नेंट लड़की नायिका है, तो इस मूवी में एसपी महिला के रोल में नेहा धूपिया भी प्रेग्नेंट दिखाई गई हैं. उसमें अधिकारी, कर्मचारी दफ्तर में बंधक थे, तो इस मूवी में बच्चे बंधक बनाए गए हैं. एक्टिंग की बात करें तो अतुल कुलकर्णी, यामी गौतम और नेहा धूपिया मंझे हुए कलाकार हैं, सो सवाल उठाने की गुंजाइश नहीं. यामी गौतम को थोड़ा अलग किस्म की भूमिका मिली है, उसमें वो कामयाब रही हैं. डिम्पल कपाड़िया का रोल ज्यादा बड़ा था नहीं, करणवीर शर्मा को जितना भी रोल मिला, उसमें वो फिट रहे हैं।

म्यूजिक की इस मूवी में कोई जरूरत थी नहीं, क्योंकि स्कूल के इर्द-गिर्द ही मूवी थी, सो डायरेक्टर को ज्यादा मेहनत भी नहीं करनी पड़ी होगी. हालांकि मेहनत हुई होगी तो स्क्रीन प्ले और कहानी के एक एक सीन को सस्पेंस के साथ बांधने में, जिसमें मोटे तौर पर मान लीजिए कि देखने वाला बंधा रहता है. लेकिन ये भी मान ही लीजिए कि मूवी में नया कुछ भी नहीं है। कुल मिलाकर एक टाइम पास सस्पेंस थ्रिलर है, जिसकी हीरो हैं यामी गौतम. साथ ही में एक अनोखा सामाजिक संदेश इस मूवी में देने की कोशिश की है गई है, जो इमोशनली उतना दर्शकों के साथ जुड़ नहीं पाता, यहां आप डायरेक्शन की कमी महसूस कर सकते हैं कि उसने अपने सबसे खास मुद्दे के लिए नींव मजबूत तरीके से नहीं रखी. फिर भी मूवी ज्यादा लम्बी नहीं है, इसलिए बोर नहीं करती. लेकिन अगर डायरेक्टर की ख्वाहिश इसे ऐसी मूवी बनाने की थी, जिसकी कि गली गली चर्चा हो तो उन्हें मान लेना चाहिए कि उसके लिए ओरिजनल आइडियाज की जरूरत होती है, किसी नकल की नहीं. जिन लोगों ने ‘एक्ट 1978’ देखी होगी, उन्हें इस मूवी में उतना मजा नहीं आएगा।

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