JYOTIBA PHULE
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कैसे एक दोस्त के उपहास ने ज्योतिबा फुले को समाज सुधारक बना दिया!

ज्योतिराव गोविंदराव फुले 19वीं सदी के एक महान आज तारीख है 11 अप्रैल 2022 और आज की तारीख का इतिहास जुड़ा है समाज सुधारक, समाज प्रबोधक, विचारक, समाजसेवी, लेखक, दार्शनिक तथा क्रान्तिकारी कार्यकर्ता महात्मा फुले एवं ”ज्योतिबा फुले के नाम से प्रसिद्ध ज्योतिराव गोविंदराव फुले से। उनका जन्म आज ही के दिन 11 अप्रैल 1827 में महाराष्ट्र के सतारा में हुआ था। उन्होंने अपना पूरा जीवन स्त्रियों को शिक्षा का अधिकार दिलाने, बाल विवाह पर रोक लगवाने के प्रयासों में लगा दिया।

पुराने समय मे महिलाओ की स्थिति कितनी खराब हुआ करती थी इस बात का हैं अंदाज़ा भी नही लगा सकते। आज जो हम महिलाएं स्कूल- कॉलेज में स्वतंत्र रूप से पढ़ पा रही है, खुद के अधिकारों के लिए आवाज़ बुलंद कर पा रही है, अपनी मर्ज़ी का काम करने के लिए बाहर निकल पा रही है, अपने सपनों को साकार कर रही हैं, तो इस सब का श्रेय भारत की कुछ महान विभूतियों को जाता है। इन्हीं विभूतियों में से से एक नाम ‘महात्मा ज्योतिराव फुले’ का है। ज्योतिबा फुले के माता-पिता पुणे के गोविंदराव और चिमनाबाई थे और उनका परिवार पेशवाओं के लिए फूलवालो के तौर पर काम करते थे। इस कारण उन्हें मराठी में ‘फुले’ कहा जाता था। 

ज्योतिबा फुले जब अपनी किशोरावस्था में थे तब उनकी शादी सावित्रीबाई फुले से हुई,वर्ष था 1840।उसके बाद का एक घटनाक्रम आपको बताती हूँ। एक दिन वो अपने एक मित्र की शादी में शामिल हुए। उनका वह मित्र उच्च जाती का था। वहाँ ज्योतिबा फुले का उनकी जाती व सामाजिक पृष्ठभूमि के कारण अपमान किया। इस घटना का उनके मन पर गहरा प्रभाव पड़ा। इन घटना से ही ज्योतिबा फुले ने जाति व्यवस्था की बुराइयों को चुनौती देने का संकल्प लिया। उनकी पत्नी सावित्री बाई फुले भीआगे चलकर एक महान समाजसेविका के रूप में उभरीं। इन दोनो ने एक गाड़ी के दो पहिये की तरह सामंजस्य बैठा कर अनेको सामाजिक कार्य किये। दोनों ने मिलकर 1848 में पहला गर्ल्स स्कूल खोला।इस तरह सावित्रीबाई फुले न सिर्फ इस स्कूल की, बल्कि पूरे देश की पहली महिला शिक्षिका बनीं।

ज्योतिबा फुले ने विधवाओं के लिए आश्रम बनवाए व उनके पुनर्विवाह के लिए खूब संघर्ष किया। बाल विवाह के दुष्परिणामों को लेकर वो लोगों को जागरूक करते रहे। 1873 में उन्होंने ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना की। 1888 में महात्मा ज्योतिबा फुले लकवाग्रस्त हो गए। 20 नवंबर, 1890 को उनका निधन हो गया। लेकिन हमारे देश के लिए, समाज के उत्थान के लिए उन्होंने जो कार्य किये है वो अतुलनीय, अमर और अविस्मर्णीय है।

ज्योतिबा फुले कहते थे – स्त्री और पुरुष जन्म से ही स्वतंत्र हैं। इसलिए दोनों को सभी अधिकार समान रूप से भोगने का अवसर प्रदान होना चाहिए। शिक्षा के बिना समझदारी खो गई, समझदारी के बिना नैतिकता खो गई, नैतिकता के बिना विकास खो गया, धन के बिना शूद्र बर्बाद हो गया। शिक्षा महत्वपूर्ण है। उनके ये विचार सदा हमे राह दिखाएंगे।

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