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श्री लंका में अब संसद बनेगी ताकतवर, प्रेसीडेंट अहम फैसले नहीं ले पाएंगे।

एक मशहूर कहावत है- दूध का जला, छाछ भी फूंक-फूंककर पीता है। आर्थिक और सियासी मोर्चे पर जूझ रहे श्रीलंका ने दो साल पहले राष्ट्रपति को सत्ता की सारी शक्तियां सौंपकर बहुत भारी गलती की थी। राजपक्षे परिवार ने उसे इतिहास के सबसे बुरे दौर में पहुंचा दिया। अब इस गलती को सुधारने की कोशिश हो रही है, लेकिन बहुत सोच-समझकर कदम उठाए जा रहे हैं। अब संविधान में एक बेहद अहम संशोधन किया जा रहा है। इसका सीधा मकसद सत्ता और शक्तियों का सही बंटवारा है, ताकि कोई हुक्मरान मनमर्जी या तानाशाही न कर सके।

कुछ महीने पहले देश में आर्थिक संकट शुरू हुआ। अब दिवालिया होने का खतरा है। धीरे-धीरे यह साफ होता चला गया कि राजपक्षे परिवार ने अपने सियासी रसूख का बेहद गलत इस्तेमाल किया। राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे और प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे। कैबिनेट मिनिस्टर्स में भी घोर भाई-भतीजावाद। देश दिन-ब-दिन गर्त में जाता रहा और राजपक्षे परिवार ऐश-ओ-आराम की जिंदगी जीता रहा।

पानी जब गले तक आ गया तो राष्ट्रपति गोटबाया ने भाई महिंदा को प्रधानमंत्री पद से हटा दिया। प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे की अगुआई में नई यूनिटी सरकार बनी। इसका विस्तार बाकी है।

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