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MP के जंगलों में 20 करोड़ के इनामी एक्टिव

मध्यप्रदेश के बालाघाट में 3 नक्सल कमांडरों के एनकाउंटर के बाद यहां पांव पसार रहा नक्सलवाद एक बार फिर चर्चा में है।बालाघाट और आसपास के जंगलों में वर्तमान में 6 दलम एक्टिव हैं। हर दलम में औसतन 20 मेंबर हैं। पुलिस मुख्यालय के अफसर भी मानते हैं कि बालाघाट और इसके आसपास अब भी 100 से 110 नक्सली एक्टिव हैं।

पुलिस ने नक्सलियों का जो रिकॉर्ड तैयार किया है, उसमें कई के फोटो तक पुलिस के पास नहीं हैं। जिनके फोटो हैं भी, वो 10 से 20 साल पुराने हैं। ऐसे में अगर नक्सली पुलिस के सामने भी आ जाएं, तो पहचानना मुश्किल हो जाएगा। नक्सली गांव में पैठ बनाने और आदिवासियों का भरोसा जीतने के लिए उनकी बेटियों से शादी भी कर रहे हैं।

दो दिन पहले ही एनकाउंटर में जोनल कमांडर नागेश, एरिया कमांडर मनोज और महिला कमांडर रामे तो मारे गए, लेकिन 15 से ज्यादा नक्सली पुलिस की घेराबंदी के बावजूद फरार होने में कामयाब रहे।

मध्यप्रदेश पुलिस रिकॉर्ड में इनमें से ज्यादातर नक्सलियों पर इनाम घोषित है। इनाम की ये राशि 3 लाख से 7 लाख तक है। इनमें से 50 नक्सलियों पर छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र ने भी अलग-अलग 5 से 10 लाख रुपए के इनाम घोषित किए हुए हैं। तीनों राज्यों में एक नक्सली पर करीब 10 से 15 लाख रुपए तक का इनाम है। पुलिस सूत्रों का कहना है कि तीनों राज्यों की पुलिस की ओर से नक्सलियों पर 20 करोड़ रुपए का इनाम घोषित है। इनाम की ये राशि नक्सलियों के कैडर के हिसाब से बढ़ती रहती है।

IG एंटी नक्सल सेल, साजिद फरीद शापू कहते हैं कि ये सही है कि 2016 के बाद दलम बढ़े हैं, लेकिन नक्सलियों का दायरा नहीं बढ़ने दिया गया है। कान्हा में सुरक्षा बलों के 2 कैंप बनाकर हमने वहां उनका रास्ता रोक दिया है। 2016 के बाद नक्सलियों ने विस्तार का प्लान बनाया था, उसी प्लान के तहत उनकी एक्टिविटी यहां बढ़ी है। स्थानीय स्तर पर मदद न मिल पाने के कारण बहुत से नक्सली लौट भी रहे हैं।

मध्यप्रदेश में बालाघाट नक्सल आंदोलन का अहम केंद्र है, इसलिए यहां नक्सलियों की एक्टिविटी लगातार बढ़ रही है। पहले यहां टांडा और मलाजखंड दलम ही थे, लेकिन अब इनकी संख्या बढ़कर 6 हो गई है। इनकी मॉनिटरिंग के लिए दो डिविजनल कमेटी बालाघाट में काम कर रही हैं। यहां नक्सलियों का मूवमेंट बढ़ने की सबसे बड़ी वजह है कि यहां के जंगल छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव और महाराष्ट्र के गोंदिया-गढ़चिरोली के जंगलों से जुड़े हैं। ये ट्राई स्टेट कॉरिडोर नक्सलियों के लिए बेहद मुफीद है। इसी बेल्ट में सबसे ज्यादा आदिवासी गांव भी हैं।

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