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Jalsa Movie Review: किसका जलसा दिखेगा आखिर विद्या बालन की इस मूवी में?

जीवन के जलसे ऐसे ही होते हैं। सब अपना-अपना तंबू तानने में लगे रहते हैं। पता भी नहीं चलता कि शामियाने में लगे किस बांस पर किसकी शातिर निगाह लगी हुई है। फिल्म ‘जलसा’ ऐसी ही एक कहानी है। जिंदगी से छूटती और जिंदगी को पकड़ती कुछ धड़कनों की कहानी, जिसके सारे अहम सिरे महिलाओं ने पकड़ रखे हैं। ये सिनेमा में महिला किरदारों को मिली तवज्जो का ‘जलसा’ है।

विद्या बालन को अपनी फिल्म ‘डर्टी पिक्चर’ से हिंदी सिनेमा की लीक बदले 10 साल से ज्यादा हो गए। कोरोना में लॉकडाउन लगा तो उनकी पिक्चर ‘शकुंतला देवी’ प्राइम वीडियो पर ‘गुलाबो सिताबो’ के बाद सबसे ज्यादा देखी गई फिल्म बनी। फिर ‘शेरनी’ में वह दहाड़ीं और अब अभिनय का उनका ये नया ‘जलसा’ है। साथ में उनके शेफाली शाह हैं और शेफाली शाह को इन दिनों कैमरा देखकर जो हो रहा है, वह सामान्य नहीं है। विद्या बालन की फिल्म में उनके नीचे से कालीन खींच ले जाने की इतनी कुव्वत शायद ही पहले किसी कलाकार ने बीते 10 साल में दिखाई हो। खैर, उस पर भी आते हैं। पहले थोड़ा ‘कहानी’ बताते हैं। विद्या यहां न्यूज पोर्टल की हिट एंकर हैं माया मेनन। इंटर्न, ट्रेनी पत्रकारों के लिए ‘भगवान’ सरीखी, जिनका मोबाइल नंबर मिलना भी वरदान से कम नहीं है। माया के घर में काम करती है रुकसाना। माया की मां हैं। पति अलग होकर नया परिवार बसा चुका है। और, एक बेटा भी है। दिखने में अजब, पर अक्लमंदों से कहीं ज्यादा गजब। काम के बोझ की मारी माया को कार चलाते झपकी आती है और हादसा हो जाता है।

फिल्म ‘जलसा’ मसाला फिल्म नहीं है। इसमें कोई टोटका, आइटम सॉन्ग या श्रीवल्ली सरीखा नैन मटक्का भी नहीं। यह इंसानी रिश्तों की कहानी है। ऐसी कहानी, जिसमें अपराधी को खुद अपराध बोध होता है। हादसे की गाज जिन पर गिरी, वह इन सबसे अनजान हैं। इंसानी जान की कीमत लगती है। और, फिल्म बड़ा सवाल यह करती है कि क्या हो, अगर गरीब को अमीर की जान की कीमत लगाने का मौका मिल जाए। इस पूरे संतुलन के दो सिरे हैं विद्या बालन और शेफाली शाह। विद्या बालन ने वैसा ही उम्दा काम किया, जिसकी उनसे उम्मीद थी। वह लीक से इतर विषयों पर बनने वाली फिल्मों की सुपरस्टार हैं। ‘विकी डोनर’ और उसके बाद की पिक्चरों के फल विद्या के लगाए पौधे पर ही फूले हैं। उसी धारा में बहती नई नावों की पतवारें तापसी पन्नू, कृति सैनन और शेफाली शाह जैसी अदाकाराओं ने थाम रखी हैं। बस, इस बार विद्या ने कहानी के उत्प्रेरक का काम किया है और रंगमच छोड़ दिया है बाकी कलाकारों के करतब के लिए। फिल्म पूरे परिवार के साथ देखी जा सकती है और होली की छुट्टी में यह आपका बढ़िया पारिवारिक मनोरंजन कर सकती है।

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